गुरुवार, 10 जुलाई 2014

जीत की सीढि़यों पर....

तुम्‍हारी मुस्‍कराहटों पर,
अक्‍़सर मैं दूसरों की
खुशियाँ देखती हूँ जब
तो सोचती हूँ
ऐसा करना बस
तुम्‍हारे लिये ही संभव था,
कहा था तुमने
असंभव शब्‍द
सिर्फ डिक्‍शनरी में होता है
हक़ीकत में तो हम
लड़ना जानते हैं
एक कोशिश करते हुये
जिंदगी को पराज़य से
कोसों दूर कर
जीत की सीढि़यों पर
बस चढ़ना औ’ चढ़ना जानते हैं

... 

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

चाँद को भाये ....















हथेलियों पे
मन्‍नतों की मेंहदी
चाँद को भाये !
....
चौथ का चाँद
साक्षी बने जब भी
निर्जला प्रेम !
....
सुहागन का
विश्‍वास लिये आता
चौथ का चाँद !
....
चौथ का व्रत
अखंड सौभाग्‍य दे
सुहागन को !
....
करवा चौथ
चाँद को देखकर
हर्षाये मन !
....
सौभाग्‍य दीप
प्रज्‍जवलित कर
पूजूँ चाँद को !

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

तिरंगे की शान में !

स्‍वतंत्रता दिवस ... प्रत्‍येक वर्ष आज के दिन हम आजाद भारत का इतिहास अपने कर्णधारों को सुनाने व बताने के साथ बड़े ही उत्‍साह व सम्‍मान से ध्‍वजारोहण करते हैं। तिरंगे को फहराते ही मन में एक उत्‍साह एक उमंग सी होती है, राष्‍ट्र के प्रति हमारा प्रेम कई रूपों में जागृत होता, आज हम आजाद मुल्‍क में सांस ले पा रहे हैं इसके पीछे त्‍याग और समर्पण का जज्‍बा था जो इसे प्राप्‍त करने के लिये उस वक्‍त जुनून बन गया था उसी के परिणामस्‍वरूप इसे हासिल किया जा सका। आजादी के संग्राम को किसी बल से नहीं बल्कि सत्‍य एवं अहिंसा के रास्‍ते पर चलकर पाया गया था। प्रत्‍येक वर्ष हम स्‍वतंत्रता दिवस मनाकर वीर सेनानियों एवं महान राष्‍ट्रीय नेताओं को श्रद्धांजलि देते हैं, यह राष्‍ट्रीय पर्व हमारे गौरव का प्रतीक है।

स्‍वतंत्रता दिवस के दिन सभी सरकारी संस्‍थानों, शैक्षणिक संस्‍थाओं के साथ ही तिरंगा फहराने के साथ ही प्रमुख शासकीय भवनों पर रौशनी का किया जाना एवं खेलकूद के साथ ही कई प्रतियोगिताओं का आयोजन करने के साथ ही राष्‍ट्रीय अवकाश का घोषित होना इस बात का प्रतीक है कि हमें आज के दिन को हर्षोल्‍लास एवं भाईचारे के साथ मनाना चाहिये। राष्‍ट्र प्रेम, आपसी सद्भाव एवं भाईचारे साथ विकास के प्रति हम सदैव जागरूक रहें, अपने कर्तव्‍यों के प्रति सजग रहना हमें एक कदम आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करेगा, इसीलिए कहा भी गया है कि ....
आप में जितना अधिक अनुशासन होगा, आप में उतनी ही आगे बढ़ने की शक्ति होगी। कोई भी व्‍यक्ति जिसमें न तो थोपा गया अनुशासन है, ना ही आत्मा का अनुशासन, वह विकास की राह से विमुख हो जाएगा ...
झंडा ऊँचा रहे हमारा...
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा...
यह गीत भारत का हर बच्चा गुनगुनाता है... बड़े ही शान से। आख़िर क्या बात है इस ध्वज में जिसने आज़ादी के परवानों में एक नया जोश भर दिया था और जो आज भी हर भारतीय को अपने गरिमामय  इतिहास की याद दिलाता है और विभिन्नता में एकता वाले इस देश को एक सूत्र में बाँधे हुए है। देश के प्रथम नागरिक से लेकर आम नागरिक तक इसे सलामी देता है। 21 तोपों की सलामी से सेना इसका सम्मान करती है। किसी भी देश का झंडा उस देश की पहचान होता है। तिरंगा हम भारतीयों की पहचान है। इसी के साथ ध्वज के सम्मान की बात भी स्पष्ट कर दी गई कि ध्वज फहराने के समय किस आचरण संहिता का ध्यान रखा जाना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज कभी भूमि पर नहीं गिरना चाहिए और ना ही धरातल के संपर्क में आना चाहिए।
आज 67वें स्‍वतंत्रता दिवस के अवसर हम एक बार फिर से वीर सेनानियों को श्रद्धासुमन अर्पित करने के साथ यही कामना करते हैं कि इसका सम्‍मान युगों युगों तक यूँ ही कायम रहे .... एवं हम अपने कर्तव्‍यों के प्रति सदैव जागरूक रहें ... 

तिरंगे की शान में जब भी, सुमन अर्पित करता हूँ,
देश तुझे ये दिल ही नहीं जां भी समर्पित करता हूँ ।

 
जय हिन्‍द !



सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

ये शौक़ भी ... !!!

मायने बदल जाते हैं हर बार,
हर शब्‍द के
जिन्‍दगी में कई बार
कहते सुना
आराम हराम हो गया :)  सच
पहेलियाँ बूझने की उम्र नहीं रही
पर फिर भी लोगों को
जाने क्‍यूँ पहेलियाँ बुझाने में
ज्‍यादा आनन्‍द आता है
सामने वाले का
चैन उन्‍हें भाता जो नहीं
किसी विधि हर लिया जाये
बस नित नये तरीके अपनाना
आदत में शामिल कर लिया
तभी से पहेलियाँ बुझाने का
नया शौक पाल लिया
....
कुछ लोग हुनरमंद होते हैं
लेकिन फिर भी अपना हुनर
कभी भी कायदे के काम में नहीं लेते
हमेशा बेक़ायदा हो
हाजि़र हो जाते हैं किसी भी वक्‍़त
गैरजरूरी काम में खुद तो उलझते ही हैं
दूसरों को भी उलझाने का
शौक़ पाल लेते हैं
....
ये शौक़ भी बड़ी अज़ीब शय है
कभी आपसे ये
अपने सुकून के लिये
जाने कितने जतन करा लेता है
कितने ही मन चाहे काम
व्‍यर्थ करा लेता है !!!!!!!
... 

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

जाने कितनी बार !!!

जब से हालात बदले हैं
हर पिता का मन
मां की सोच का समर्थन
करने लगा है
...
कभी हँस कर टाल दिया करता था
जो मन माँ की सोच को
तुम तो नाहक ही चिं‍ता करती हो
वह अब बिटिया के जरा सी देरी पर
अन्‍दर बाहर होता है ....
शाम ढले जाने कितनी बार !!!

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

श्रद्धासुमन करें अर्पित !!














चिर निद्रा में
संगीत का सितारा
हुआ है लीन !
....
मौन सितार
स्‍वर छेड़े कौन
किससे कहे !
...
जब बजेगा
तारसप्‍तक वो
याद आएगा !
...
भीगे नयन
श्रद्धासुमन करें
अर्पित बस !
...
दिल की बात
जब हाइकू कहे
गहराई से !
...
मान उनका
शब्‍द रखते ये
कहते हुये !

...

शनिवार, 24 नवंबर 2012

हारकर भी ... !!!

प्रेम को तुम
जिंदगी बनाना तो
सम्‍मान से !
.....
प्रेम जब भी
खामोश होता है तो
जता जाता है !
....
अपना दर्द
छुपाया तो जाना ये
कैसा होता है !
...
हारकर भी
जो नहीं हारता है
वही विजेता !
...
जीत की भाषा
सिर्फ अहसास से
समझी जाती !
...

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

रश्मि प्रभा जी की पुस्‍तकें ... इंफीबीम पर !!!

आप सब इनकी लेखनी से बखूबी परीचित हैं ... जी हां जिक्र है आज
आदरणीय रश्मि प्रभा जी की पुस्‍तकों का जो उपलब्‍ध हैं एक साथ ... 40 प्रतिशत की विशेष छूट के साथ
तो आइये मिलते हैं उनकी पुस्‍तकों से

(1) शब्‍दों का रिश्‍ता ...







शब्दों के बीच आम इंसान बहुत घबराता है!
शब्दों का जोड़-घटाव उनके सर के ऊपर से गुजरता है
वे भला कैसे जानेंगे उनको-
जिनके सर से होकर आँधियाँ गुज़रती हैं....

(2) अनुत्तरित ....





अनुत्तरित सवाल 
परिक्रमा करते हैं रूह की तरह
चाहते हैं उत्तर का तर्पण 
पर जहाँ अपनी सोच से उठते है सवाल 
होते हैं अक्सर अनुत्तरित
(3) महाभिनिष्‍क्रमण से निर्वाण तक ...



निर्वाण सत्य है या असत्य 

जो भी है .... इसकी चाह है 
चाह को पाने के लिए होता है महाभिनिष्क्रमण ...
महाभिनिष्क्रमण !
घर त्याग 
या मन का त्याग ?
(4) खुद की तलाश ...
यह तलाश क्‍या है,  क्‍यूँ है
और इसकी अवधि क्‍या है !
क्‍या इसका आरंभ सृष्टि के आरंभ से है 
या सिर्फ यह वर्तमान है
या आगत के स्रोत इससे जुड़े हैं ?

आप इन सबको एक साथ पा सकते हैं इंफीबीम पर तो फिर चलें !!!
Rashmi Prabha Combo
या फिर डॉयल करें .... 079- 40260260

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

अपनी ही मैं में ....

दर्द आज़ अपनी ही पीड़ा को
पीना चाहता है आँसुओं की शक्‍ल में
सिसकियों का रूदन
कब चिन्हित हुआ रूख़सार पर
वो हतप्रभ है औ भयाक्रान्‍त भी
इस आक्रोश पर
सर्जक का आवेग बहा ले जाता है
अपनी ही मैं में
बिना किसी की कोई बात सुने
....
ज़बां का खामोश होना
सारे प्रयासों को विफ़ल कर हर बार
दाग देता अपने ही जि़स्‍म में
अनेको शब्‍द बाण
आहत हो मन खुद की शैय्या तैयार कर
विचलित सा अंत की प्रतीक्षा में
अनंत पलों का संहार कर
विषादमय हो
बस प्रतीक्षा करता है अंत की
अनंत पलों तक

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

एक बांध सब्र का ...

दर्द की भाषा कभी पढ़ी तो नहीं मैने
बस सही है हर बार
एक नये रंग में
उसी से यह जाना है
ये दर्द जब भी होता है
किसी अपने को तो
कई बार हमारी आंखों से भी
बह निकलता है
इसकी पीड़ा से जब व्‍याकुल होता है
हमारा ही कोई स्‍नेही तो हम भी
दर्द की अनुभूति करते हैं
मन ही मन उसका पैमाना तय करते हैं
...
लेकिन यह भी सच है
अपने हिस्‍से का दर्द हमेशा
खुद को ही सहना होता है
तभी तो हर मन में होता है
एक बांध सब्र का
जिसमें होते हैं कुछ हौसले
कुछ उम्‍मीदें कुछ समझौते
जिन्‍हें मजबूती देता है विश्‍वास
जिससे बुलंद होता है
हर एक अहसास
...

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

जिंदगी की तरह ...

किताबों में सिर्फ़ शब्‍द ही नहीं होते
उन शब्‍दों के अर्थ जिन्‍दगी से होते हैं
कुछ किताबें होती हैं बिल्‍कुल
जिन्‍दगी की तरह
कभी सुलझी कभी उलझी
कभी भावनाओं में ब‍हती हुई
किताबों सा हमनशीं कोई नहीं होता
कभी शिका़यत नहीं कभी बेरूखी नहीं
जब तुमने चाहा वो तुम्‍हारे
साथ हो लेती हैं
बिना थके वर्क़ दर वर्क़
खुलती जाती हैं
बिना किसी झुंझलाहट के !!!
...

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

उसे पता था .. !!!

जड़ों को विस्‍तार देती
धरती ने
कभी भी पेड़ को
भार नहीं माना
उसका विशालता से
कभी नहीं सहमी
उसे पता था
उसका साया आकाश है ...
..........................................

प्रेम
इस ढाई अक्षर ने
कितनों की जिन्‍दगी के
मायने बदल दिये
जिनके पास यह होता है
उनके पास एक
विस्‍तृत आकाश होता है
जिनके पास से
यह चला जाता है
उनके पास आंसुओं का
पूरा सैलाब होता है
....





बुधवार, 29 अगस्त 2012

मन ...

मन .. हमारे शरीर का एक ऐसा हिस्‍सा जिसे हम में से किसी ने नहीं देखा लेकिन हमारा शरीर पूरी तरह से इसके अधीन रहता है ... सारे क्रिया-कलापों का कर्ता-धर्ता यही है ... चंचल चपल हमेशा अपनी ही करने वाला अधीर सा यह मन किसी नटखट बालक की भांति प्रतीत होता है ... इसका बचपना कभी नहीं जाता पल में उदास तो पल में खुश कभी लम्‍बी उड़ान भरता और जा पहुँचता उनके पास जो सात समंदर पार हैं या मीलों की दूरियाँ हैं जिनके बीच कभी सबके बीच में रहकर भी तन्‍हा हो जाता बगल में कौन बैठा है ? उससे भी अंजान इसकी माया निराली है तभी तो किसी ने कहा है न माला फेरत जुग गया गया न मन का फेर ...आप लाख कोशिश कर लो पूजा पाठ की जप तप की यदि मन नहीं चाहेगा तो कुछ भी करना संभव नहीं या फिर जो भी किया सिर्फ़ दिखावे के लिए ही किया ...
इसके फ़ेर में आने से कोई बचा भी तो नहीं क्‍योंकि इसे दिखावा करना भी खूब आता है ... यदि यह नहीं चाहेगा तो आप किसी को अपना सच चाहकर भी नहीं बता सकते ... तकलीफ़ सहते रहेंगे भीतर ही भीतर लाख दु:ख सतायेगा ... पर ये किसी से साझा करने ही नहीं देगा, कभी - कभी तो मुझे यह मन खिलाड़ी लगता है खेलता रहता है रोज़ नये - नये खेल और हमें खबर तब होती है जब परिणाम आता है कई बार कहता है धीरे से tit for tat ...
तभी तो कहते हैं हम सहज़ ही मन की बातें मन ही जाने ... इसकी एक बात और भी ये चंचल ही नहीं हठी भी होता है इसने जो ठान लिया उसे पूरा करके ही रहता है ..फिर चाहे कितनी भी अड़चनें आये ये पूर्णत: कृत संकल्पित हो जुट जाता है पूरे जोश के साथ ... . जैसा आज मुझे लगा इन विचारों का आपसे साझा करने का ... मैने तो कर लिया अब आपकी बारी है ... कुछ विचार आपके भी मन के बारे में ...

बुधवार, 22 अगस्त 2012

स्‍नेह की छांव में ...

आज पापा की तिथि मन रात से ही उन्‍हें अपने आस-पास महसूस कर रहा है ...
मेरी हर बात पर स्‍नेह से हां कहते और मुस्‍करा देते ...
बस उनकी वही चिर-परिचित मुस्‍कान है और पलकों पे नमीं ...

कुछ मेले बचपन के
ख्‍वाबों में अब भी चले आते हैं,
कुछ पलों के लिए
आकर पलकों पे ठहर जाते हैं
दिल को बेचैन हैं करते वो झूले जब
हम छोड़ के उंगली बाबा की
गुम हो जाते हैं
रोते हैं मिलने की फ़रियाद भी करते हैं
अश्‍कों के बीच उनको याद भी करते हैं
महसूस करते हैं उन्‍हें हर पल
सिर्फ़ महसूस ही कर सकते हैं उन पलों को ...
हर एक बात को हर एक याद को
साथ कर लेते हैं
और चल पड़ते हैं स्‍नेह की छांव में
धीमे कदमों से आहिस्‍ता - आहिस्‍ता ...

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

ठहर जाओ दम भर के लिए :)

मैंने कई दफ़ा चाहा
उतार दूँ कर्ज तुम्‍हारी दुआओं का
इन दुआओं ने मुझे कई बार
मौत की आगोश में जाने से बचाया है
जिन्‍दगी को यह कर्ज भले ही मंजूर हो
पर सच कहूँ तो मेरी आत्‍मा
इस कर्ज से मुक्ति पाना चाहती है
...
तमन्‍नाओं का  यूँ तो
कोई लेखा-जोखा नहीं रहता किसी के पास
पर जब तमन्‍ना जिन्‍दगी को जीने की होती है तो
बस यही ख्‍याल आता है
इस नश्‍वर जिन्‍दगी से इतना प्रेम किसलिए
इसका अंत एक न एक दिन तो होना निश्चित है
फिर ये भय कैसा
कभी सड़क पर चलते हुए
किसी अज्ञात वाहन की अनियंत्रित गति से
बाल-बाल बच जाने पर
ह्रदय की धड़कनों की रफ़्तार कई गुना तेज हो जाती
जिसे नियंत्रित करने के लिए
जहाँ हो जैसे हो बस ठहर जाओ दम भर के लिए :)
....

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

कुछ की फितरत होती है ....

कुछ असभ्‍य चेहरों ने
लगा लिया है नक़ाब सभ्‍यता का
हर चेहरे पर है चेहरा
कई रूपों में मिलता है यह नक़ाब
कुछ की कीमत चुकानी होती है
कुछ को छीन लिया जाता है
कुछ विरासत में पा लेते हैं
...
क़ायदा पढ़ने की चीज़ नहीं होती
सिखाने की भी नहीं होती
क़ायदा जब मन कहता है तभी
बस करने को जी चाहता है किसी का
...
बदलना यूँ तो  आसान नहीं होता,
कुछ बदलाव हालात करा देते हैं
कुछ करते हैं समझौता खुद से
पर कुछ की फितरत होती है
बदल जाने की ...
...





सोमवार, 16 जुलाई 2012

कुछ बूंदे उम्‍मीद की !!!

कुछ बूंदे उम्‍मीद की
बरसी हैं बादलों से झगड़कर
आईं हैं धरती पर प्‍यास बुझाने उसकी
मिलकर माटी से हो गई हैं माटी
सोंधेपन की खुश्‍बु जब
लिपट गई गई झूम के बयार से
सावन ने हथेली में लिया प्‍यार से
उम्‍मीद की कुछ बूंदों को
मेंहदी में मिलाकर
रचा लिया जो हथेलियों को
...
कुछ बूंदे उम्‍मीद की
बरसी हैं
किसान की आंखों से
बीज़ बो आया है धरती में
अभिषेक उसका ये सफल होगा
आने वाला कल शीतल होगा
...

बुधवार, 11 जुलाई 2012

चांद की लोरी से .....

दर्द की आंखों में सूनापन देखकर
अब जी घबराता नहीं
बस यह लगता था कि कहीं ये रो न दे
मेरी मायूसियों का चर्चा रहा
सारा दिन उसकी पलकों पे
कोई ख्‍वाब बह गया गया तो
कैसे संभाल पाएगी वह
....
कातिलों का शहर है  नींद
जाने कितने ही ख्‍वाबों का कत्‍ल होता है
हर रात यहां
गवाही देने के लिए कोई नहीं आता
तारे सो जाते हैं चांद की लोरी से
सूरज जब तक पहरे पे होता है
कोई खामोशी के लिहाफ़ से
बाहर झांकता नहीं ...

मंगलवार, 19 जून 2012

वर्ना लोग क्‍या कहेंगे ???

तुम संवेदनशील हो
बहुत अच्‍छा है
हर कोई अपना मतलब सिद्ध
कर लेता है गाहे-बग़ाहे
तुम्‍हारी संवेदनाओं की छतरी में
बारिश से बचने के लिए
और चिलचिलाती धूप में
थोड़ी सी छांव के लिए
तुम आधे भीगने का आनंद लेकर
उसे पूरा सूखा रखते हो
जलती धूप में अपनी बांह की
कोहनी तक बहते पसीने में भी
उसे छांव के नीचे रहने का सुकून देते हो
...
लेकिन जब तुम्‍हारी बारी आती है तो
उसी सामने वाले को
चक्‍कर आने लगते हैं
गिरगिट की तरह रंग बदलकर
छतरी बंद कर देता है
और लाठी की तरह टेक बनाकर
तुम्‍हारे कांधे का सहारा लेकर
चलने लगता है
....
नहीं समझे !!! तुम्‍हें समझना आता ही नहीं
यही तो समस्‍या की जड़ है
तुम संवदेनशील लोगों की
जिन्‍हें अच्‍छाई का दाना खिलाया गया
संस्‍कारों का पानी पीकर तुम बड़े हुए
फिर भला कैसे तुम
संवेदनशील नहीं होते
तुम्‍हारा मन क्‍यूँ नहीं पसीज़ता
किसी को मुश्किल में देखकर
...
लेकिन सब बदल रहे हैं
तुम कब बदलोगे ?
थोड़ा तो ज़माने के साथ चलो
वर्ना लोग क्‍या कहेंगे ???

मंगलवार, 5 जून 2012

कितना फर्क होता है न ...

तुम्‍हारी खामोशी के बीच
सन्‍नाटा घुटनों के बल
चलते हुए जाने कब
अपने पैरों पे खड़ा हो गया
देख रहा था
आपनी पारखी नज़रों से
तुम्‍हारी मायूसी को
कभी तुम्‍हारी
खिलखिलाती हँसी ने
सन्‍नाटे को भी
मुस्‍कराहटों के संग साझा किया था 
....
सन्‍नाटे ने पहली बार
महसूस किया था
हँसी की मधुरता को
तभी तो आज फिर वह विचलित था
कौन है वो ऐसा
जिसने तुम्‍हें कैद कर लिया है
उदास चेहरे के पीछे
उसने देखा दीवारों को 
जिनसे रौनक गायब थी
बिल्‍कुल तुम्‍हारे चेहरे की तरह
कितना फर्क होता है न
खिलखिलाती हँसी और फीकी हँसी में
एक बोझिल सी
एक अल्‍हड़ नदी सी ...