मंगलवार, 1 जनवरी 2013

जाने कितनी बार !!!

जब से हालात बदले हैं
हर पिता का मन
मां की सोच का समर्थन
करने लगा है
...
कभी हँस कर टाल दिया करता था
जो मन माँ की सोच को
तुम तो नाहक ही चिं‍ता करती हो
वह अब बिटिया के जरा सी देरी पर
अन्‍दर बाहर होता है ....
शाम ढले जाने कितनी बार !!!

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

श्रद्धासुमन करें अर्पित !!














चिर निद्रा में
संगीत का सितारा
हुआ है लीन !
....
मौन सितार
स्‍वर छेड़े कौन
किससे कहे !
...
जब बजेगा
तारसप्‍तक वो
याद आएगा !
...
भीगे नयन
श्रद्धासुमन करें
अर्पित बस !
...
दिल की बात
जब हाइकू कहे
गहराई से !
...
मान उनका
शब्‍द रखते ये
कहते हुये !

...

शनिवार, 24 नवंबर 2012

हारकर भी ... !!!

प्रेम को तुम
जिंदगी बनाना तो
सम्‍मान से !
.....
प्रेम जब भी
खामोश होता है तो
जता जाता है !
....
अपना दर्द
छुपाया तो जाना ये
कैसा होता है !
...
हारकर भी
जो नहीं हारता है
वही विजेता !
...
जीत की भाषा
सिर्फ अहसास से
समझी जाती !
...

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

रश्मि प्रभा जी की पुस्‍तकें ... इंफीबीम पर !!!

आप सब इनकी लेखनी से बखूबी परीचित हैं ... जी हां जिक्र है आज
आदरणीय रश्मि प्रभा जी की पुस्‍तकों का जो उपलब्‍ध हैं एक साथ ... 40 प्रतिशत की विशेष छूट के साथ
तो आइये मिलते हैं उनकी पुस्‍तकों से

(1) शब्‍दों का रिश्‍ता ...







शब्दों के बीच आम इंसान बहुत घबराता है!
शब्दों का जोड़-घटाव उनके सर के ऊपर से गुजरता है
वे भला कैसे जानेंगे उनको-
जिनके सर से होकर आँधियाँ गुज़रती हैं....

(2) अनुत्तरित ....





अनुत्तरित सवाल 
परिक्रमा करते हैं रूह की तरह
चाहते हैं उत्तर का तर्पण 
पर जहाँ अपनी सोच से उठते है सवाल 
होते हैं अक्सर अनुत्तरित
(3) महाभिनिष्‍क्रमण से निर्वाण तक ...



निर्वाण सत्य है या असत्य 

जो भी है .... इसकी चाह है 
चाह को पाने के लिए होता है महाभिनिष्क्रमण ...
महाभिनिष्क्रमण !
घर त्याग 
या मन का त्याग ?
(4) खुद की तलाश ...
यह तलाश क्‍या है,  क्‍यूँ है
और इसकी अवधि क्‍या है !
क्‍या इसका आरंभ सृष्टि के आरंभ से है 
या सिर्फ यह वर्तमान है
या आगत के स्रोत इससे जुड़े हैं ?

आप इन सबको एक साथ पा सकते हैं इंफीबीम पर तो फिर चलें !!!
Rashmi Prabha Combo
या फिर डॉयल करें .... 079- 40260260

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

अपनी ही मैं में ....

दर्द आज़ अपनी ही पीड़ा को
पीना चाहता है आँसुओं की शक्‍ल में
सिसकियों का रूदन
कब चिन्हित हुआ रूख़सार पर
वो हतप्रभ है औ भयाक्रान्‍त भी
इस आक्रोश पर
सर्जक का आवेग बहा ले जाता है
अपनी ही मैं में
बिना किसी की कोई बात सुने
....
ज़बां का खामोश होना
सारे प्रयासों को विफ़ल कर हर बार
दाग देता अपने ही जि़स्‍म में
अनेको शब्‍द बाण
आहत हो मन खुद की शैय्या तैयार कर
विचलित सा अंत की प्रतीक्षा में
अनंत पलों का संहार कर
विषादमय हो
बस प्रतीक्षा करता है अंत की
अनंत पलों तक

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

एक बांध सब्र का ...

दर्द की भाषा कभी पढ़ी तो नहीं मैने
बस सही है हर बार
एक नये रंग में
उसी से यह जाना है
ये दर्द जब भी होता है
किसी अपने को तो
कई बार हमारी आंखों से भी
बह निकलता है
इसकी पीड़ा से जब व्‍याकुल होता है
हमारा ही कोई स्‍नेही तो हम भी
दर्द की अनुभूति करते हैं
मन ही मन उसका पैमाना तय करते हैं
...
लेकिन यह भी सच है
अपने हिस्‍से का दर्द हमेशा
खुद को ही सहना होता है
तभी तो हर मन में होता है
एक बांध सब्र का
जिसमें होते हैं कुछ हौसले
कुछ उम्‍मीदें कुछ समझौते
जिन्‍हें मजबूती देता है विश्‍वास
जिससे बुलंद होता है
हर एक अहसास
...

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

जिंदगी की तरह ...

किताबों में सिर्फ़ शब्‍द ही नहीं होते
उन शब्‍दों के अर्थ जिन्‍दगी से होते हैं
कुछ किताबें होती हैं बिल्‍कुल
जिन्‍दगी की तरह
कभी सुलझी कभी उलझी
कभी भावनाओं में ब‍हती हुई
किताबों सा हमनशीं कोई नहीं होता
कभी शिका़यत नहीं कभी बेरूखी नहीं
जब तुमने चाहा वो तुम्‍हारे
साथ हो लेती हैं
बिना थके वर्क़ दर वर्क़
खुलती जाती हैं
बिना किसी झुंझलाहट के !!!
...