शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

1411 की सुरक्षा करें ....


देर आये दुरूस्‍त आये कहना सही न होगा, हमारी चेतना जागृत हुई लेकिन जब इनकी संख्‍या बची मात्र 1411 जंगल का राजा बाघ इसकी राजसी जीवन शैली के साथ इसकी आक्रामकता जिसको देख सभी भयभीत होते रहे हैं, और इससे बचकर निकल जाने में ही अपनी भलाई समझते थे, परन्‍तु आज इनकी कम होती संख्‍या को देख सजग नागरिक चिंतित हैं, कि आने वाले समय में क्‍या हम इसे तस्‍वीरों में ही देख पाएंगे, या यह वास्‍तव में अभ्‍यारण्‍य की शान बढ़ाते हुये आगे भी जीवित रहेंगे, अब हम पर इनकी सुरक्षा का दायित्‍व है, इनका शिकार कर असमय इन्‍हें काल के गाल में भेजना शोभा नहीं देता, कभी इसकी धारीदारी खाल मन मोह लेती या इन्‍हें अपने निशाने पर लेने का शौक इनकी मौत का कारण बन जाता है, राष्‍ट्रीय पशु बाघ की सुरक्षा के लिये कदम उठाना नितांत आवश्‍यक हो गया है, मां दुर्गा की सिंह सवारी के रूप में ख्‍यातिप्राप्‍त यह चित्रों और मूर्तियों में गढ़ा जाने वाला क्‍या इसी रूप में स्‍मृतिवान रहेगा, या फिर अभ्‍यारण्‍य में अपनी खूंखार गर्जना से गुंजायमान रख पाएगा, यह सोचनीय विषय है, यह राह है तो दुर्गम परन्‍तु कुछ लोग साथ मिलकर एक स्‍वर में 1411 को सुरक्षित रखने का बीड़ा उठाएंगे तो मुश्किलें कुछ हद तक कम हो जाएंगी, इसी विश्‍वास के साथ की आप भी आगे आएंगे अपने विचारों के साथ ।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

गुमनाम होता सर्कस ....



सर्कस यह नाम शायद आने वाली पीढ़ी के लिये अपरचित हो जाएगा, बदलते दौर में करतबों की बाजीगरी अब मुश्किल हो चली है, जहां एक डेढ़ दशक पहले जिस शहर में सर्कस लगना होता था, इसके तम्‍बू व पण्‍डाल लगते ही लोग रूचि लेने लगते थे कि कब शुरू होगा, और अब इसका बिल्‍कुल उल्‍टा होने लगा है, अब सर्कस कम्‍पनी शहर में प्रवेश करते ही प्रचार-प्रसार करने लगती है कि दूर-दराज के लोग भी इसे देखने के लिये पहुंच सकें, किसी भी शहर में कम से कम अवधि इसकी एक माह होती है, 25-30 वाहनों के काफिले में इनका पूरा साजो-सामान पहुंचता है और फिर एक बड़ा तम्‍बू लगाकर इसका रिंग तैयार किया जाता है, जिसके चारों तरफ दर्शकों के बैठने की व्‍यवस्‍था रहती है। सर्कस में तरह-तरह के वन्‍य प्राणी भी रखे जाते हैं, जो दर्शकों का मनोरंजन करते हैं लेकिन आजकल कुछ वन्‍य प्राणियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है पहले शेर और हाथी इसका मुख्‍य आकर्षण हुआ करते थे, लेकिन अब शेर पर तो प्रतिबंध लगा दिया गया है जिसकी वजह से सर्कस पूरी तरह से इसमें शामिल सदस्‍यों पर ही निर्भर रह गया है जिसमें कई तरह के मंझे हुये कलाकार होते हैं जो अपनी कला से दर्शकों में एक रोमांच पैदा करते हैं लड़कियां भी इसमें अपने सधे हुये करतब दिखाती हैं, सर्कस खतरों से भरा हुआ एक ऐसा क्षेत्र है जहां जरा सा भी आप फिसले तो आपकी जिन्‍दगी के लेने देने पड़ सकते हैं, फिर भी इसमें जुड़े हुये कलाकार एक से बढ़कर एक कलाबाजियां दिखाते हैं कि आने वाले दर्शकों का मनोरंजन हो सके, लेकिन अब वह पुराने दिन लौटकर आने वाले नहीं लगते और सर्कस धीरे-धीरे गुमनामी के अंधेरे में खोता जा रहा है।

सर्कस के एक ग्रुप में करीब डेढ़ सौ लोग रहते हैं इनका प्रतिदिन का खर्च ही तीस हजार के ऊपर का होता है, पर्याप्‍त मात्रा में दर्शकों का न पहुंचना, इनके बन्‍द होने की स्थिति निर्मित कर रहा है, लोगों की रूचियों के बदलते भागम भाग एवं रोजमर्रा की बढ़ती जरूरतों के चलते पर्याप्‍त संख्‍या में दर्शकों के न मिल पाने से कई सर्कस तो पहले ही बन्‍द हो चुके हैं और जो गिने-‍चुने चल रहे हैं वह भी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, कब तक यह बदहाली की मार झेल पाते हैं कह पाना मुश्किल है ।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

राष्‍ट्र गीत कोई ....









आओ मिलके

करने चलें नमन,

तिरंगा

भारत मां की शान में

लहरा रहा

राष्‍ट्र गीत कोई बच्‍चा

सच्‍चे मन से गा रहा ।

गणतन्‍त्र दिवस की शुभकामनाएं

बुधवार, 20 जनवरी 2010

सच्‍चाइयों की बस्तियां ....


संवेदनाओं के शिखर अब ढहने लगे हैं,

नयनों में भी अश्‍को की छटपटाहट है ।

सच्‍चाइयों की बस्तियां वीरान हैं जबसे,

झूठ की ऊंची इमारतों में जगमगाहट है ।

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

इक सुराख से ....







हर कश्‍ती का ख्‍वाब होता है समन्‍दर,

पर हर कश्‍ती डरती है इक सुराख से ।

मानव तन पे अभिमान जीते जी कितना,

अंत होता तन का तो बन जाता राख ये ।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

विचारमाला ....


आस्‍था जो कि विश्‍वास का दूसरा रूप है, अब वह किसी के प्रति हो, चाहे ईश्‍वर के प्रति हो, माता-पिता के लिए हो, अपने गुरूजनों के लिए हो, मन में जाने कैसे इसके बीज अंकुरित हो जाते हैं जब से हम होश संभालने लायक होते हैं, आजकल तो नासमझ छोटे बच्‍चे भी जब देखते हैं कि हम अपने देवघर या पूजा के लिये बनाये गये अपने आस्‍था के छोटे से कोने में ईश्‍वर को नमन करते हैं तो वे भी अपने विवेक से वहां अपना शीष झुका लेते हैं, हमें उन्‍हें सिखाने की जरूरत नहीं पड़ती और हम अपने बड़ों को देखते-देखते जाने कब आस्‍थावान हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता, जरूरी नहीं कि हम आस्तिक होंगे तभी आस्‍था हममें पनपेगी, क्‍योंकि नास्तिक के मन में भी किसी ना किसी के लिये श्रद्धा तो होती ही है वो भी किसी न किसी पर तो विश्‍वास करता ही चाहे उसका अंश कितना भी हो, परन्‍तु आस्‍था तो उसके भीतर है ही फिर चाहे वह ईश्‍वर के प्रति हो या अपने बड़े बुजुर्गों के प्रति वह आस्‍थावान तो है ही .....इस सृष्टि की रचना करने वाला कोई इंसान तो नहीं, धरती के सीने में किसान अन्‍न का एक दाना बोता है तो जाने कितने ही दाने उगते हैं इन दानों में छिपा कोई तो है प्रकृति कण-कण में हमें इस ओर इंगित करती रहती है कि कोई तो है जिस वजह से यह संसार चल रहा है, और यह एक परम सत्‍य है जो हमें आस्‍थावान बनाता है ....

हमारी आस्‍था किसमें है

उन संस्‍कारों में

जो हमें अपने बुजुर्गों से मिले हैं

या फिर

मन्दिर में रखी उन बेजान

पाषाण प्रतिमाओं में है

जो हमें

घोर निराशा के क्षणों में भी

अपने पास खींच ले जाती हैं

जिनमें हम महसूस करते हैं

ईश्‍वर का अंश

या कोई ऐसा जिसके

आगे श्रद्धान्‍वत होने को जी चाहे ।

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

सलाम इनके जज्‍बे को ...


आज की नारी में अदम्‍य साहस एवं शक्ति की कमी नहीं, इस बात का परिचय दिया कल 25 नवम्‍बर बुधवार को हमारी महामहिम महिला राष्‍ट्रपति श्रीमती प्रतिभादेवी पाटिल ने अत्‍याधुनिक लड़ाकू विमान सुखोई-30 में उड़ान भरकर इतिहास रच दिया, ऐसा करने वाली वह दुनिया की पहली महिला राष्‍ट्राध्‍यक्ष हैं, सुखोई में करीब 30 मिनट तक उड़ान भरने वाली 74 वर्षीय सबसे उम्र दराज महिला का रिकार्ड भी उनके नाम दर्ज हुआ जो कि समस्‍त महिलाओं के लिये गर्व की बात है, बेटियों के जन्‍म पर दुखी होने वाले माता-पिता को भी सीख लेनी चाहिए की यदि वह अपनी बेटी को सही शिक्षा-दीक्षा देते हैं तो वह उनका नाम रौशन करने में पीछे नहीं हटेगी फिर चाहे वह खेल का मैदान हो, या देश की सत्‍ता संभालना हो, सुखोई की इस उड़ान में उनकी यही प्रेरणा व संदेश था हम सभी के लिये कुछ करने का साहस या जज्‍बा यदि मन में हो तो मुश्किलें खुद-ब-खुद पीछे हट जाती हैं।