मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

दर्द से ...









टूटी खाट पर

जब भी मां

मैं तेरा बिस्‍तर लगाता हूं

मेरी पीठ

दर्द से दुहरी हो जाती है ।

मैं समेटता हूं

सपनों को बन्‍द करके आंखों को

जब भी

गरम आंसुओं की

कुछ बूंदे

तेरा दामन भिगो जाती हैं ।

एक सिहरन पूरे शरीर में होती है,

जब तेरी झुकी कमर

टेककर लाठी

मेरे लिये खेतों पे रोटी लाती है ।

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक प्रस्तुति...आज के समय में इतना प्यार करनेवाला बेटा होना बहुत सौभाग्य की बात है...मन को अंदर तक छू जाती है बेटे की विवशता..बहुत सुन्दर

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  2. भावुक कर देने वाली प्रस्तुति !

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  3. क्या दर्द समेटकर ले आई है आपकी ये रचना !!हमें भी दर्द दे गई। और कुछ आँसु आँखों में भी छोड गई।

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  4. ma ke haath ki roti,
    kha kar ho jata man tript,
    andhera chhant jata hai tab ,
    jab dikkhe man ka chehra deept.

    aapke sundar ehsaas prashansneey hain.Achhi bat hai ki jo aap mahsus kar rahi use kam shabdon me itni praveenta ke sath aapne bayan kiya hai.
    likhte rahiye.

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  5. सदा जी आपका चित्र कहाँ मिलेगा । ब्लागर परिचय
    के लिये । राजीव ब्लाग वर्ल्ड काम ।

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  6. बस आँखें नम हो गयी। शुभकामनायें।

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  7. बहुत ही प्यारी रचना है
    माँ के प्रति भावमयी पंक्तियाँ दिल को छू गयीं

    आपको बहुत शुभ कामनाएं

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  8. सच , अत्यंत मार्मिक प्रस्तुति.
    अभिवादन.

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