बुधवार, 16 दिसंबर 2009

इक सुराख से ....







हर कश्‍ती का ख्‍वाब होता है समन्‍दर,

पर हर कश्‍ती डरती है इक सुराख से ।

मानव तन पे अभिमान जीते जी कितना,

अंत होता तन का तो बन जाता राख ये ।

15 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई एक सुराख पूरी कश्ती को डुबो देती है
    बेहतरीन

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  2. इक सुराख काफी है...

    सुनदर प्रस्तुति

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  3. यथार्थपूर्ण रचना

    कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
    वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
    डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
    इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
    और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये

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  4. बहुत ज्ञानवर्धक रचना..... बेहतरीन प्रस्तुति....

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  5. अजय जी, आपका बहुत-बहुत आभार, वर्ड वेरीफिकेशन भरने में बहुत दिक्‍कत होती है ऐसा मेरा स्‍वयं का भी मानना है, परन्‍तु ध्‍यान ही नहीं गया कि यह मेरे द्वारा बन्‍द नहीं किया गया है, अब इसे मेरे द्वारा हटा दिया गया है ।

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  6. बहुत सटीक बात....बहुत खूब

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  7. खूबसूरत अभिव्यक्ति...बधाई हो..

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  8. भावों को इतनी सुंदरता से शब्दों में पिरोया है
    सुंदर रचना....

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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