गुरुवार, 21 मई 2009

इसका शीर्षक आपको स्‍वयं रखना है . . .

ईश्‍वर एक है परन्‍तु उसके रूप अनेक हैं इस बात को बहुत ही ज्ञानी ध्‍यानी, साधु महात्‍मा पहले ही कह चुके है, फिर उस बात को दोहराना कोई बहुत जरूरी तो नहीं है, लेकिन अपनी बात की शुरूआत सिर्फ इसी लहजे से हो सकती है . . . कोई आठ-दस साल पहले की बात है, हमारे पड़ोस में एक गुप्‍ता परिवार रहा करता था, उनकी बाजार में एक मिठाई की दुकान थी जो अच्‍छी-खासी चलती थी, लेकिन उनकी पत्‍नी पेट की तकलीफ से हमेशा ही परेशान रहा करती थी वे भी हर जगह उसका इलाज कराने ले गये लेकिन उसे कहीं आराम ना लगा, इसी वजह से वे परेशान रहने लगे जिससे उनकी दुकान पर भी असर पड़ने लगा, फिर किसी ने उन्‍हें एक दिन सलाह दी कि वे संत आसाराम बापू आश्रम से जुड़ जायें, एवम उनके द्वारा निर्मित दवाओं से अपनी पत्‍नी का इलाज करा के भी देखे, वे सबकुछ करके थक हार चुके थे, उन्‍होंने सोचा इसे भी कर के देख लेते हैं वे अपनी पत्‍नी को उनके सूरत स्थित आश्रम ले गये, करीब एक वर्ष पश्‍चात इसका परिणाम सुखद रहा कि उनकी पत्‍नी के स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार था।

फिर तो उनके मन में पूरी तरह उनके प्रति श्रद्धा जाग उठी, वे उनके अनन्‍य भक्‍त हो गये, उनके शहर में कोई भी बापू जी का कार्यक्रम होता, वो सबसे पहले आगे होते, इसके पश्‍चात उनका व्‍यापार भी बढ़ा एक दुकान से दो दुकानें हो गई, स्‍वयं का मकान भी बनवा लिया, जहां वह पैदल आया जाया करते थे, वहां अब वह कार से चलने लगे, तो कहने का तात्‍पर्य भक्ति में शक्ति, है या विश्‍वास . . . जहां अपनी मेहनत तो होती ही है लेकिन एक विश्‍वास जो अटूट एवं दृढ.निश्‍चयी बनाता है इंसान को, और दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं फलां व्‍यक्ति ने इसकी आराधना की तो वह सुखी एवं सम्‍पन्‍न हो गया, तो पहले तो वह भगवान शिव की पूजा किया करता था फिर व‍ह हनुमान जी की करने लगता है . . . लेकिन कुछ दिनों में यदि उसे परिणाम नहीं मिलता तो वह‍ फिर निराश हो जाता है, और पूजा, जप तप इन सब चीजों से उसका विश्‍वास उठ जाता है ।
आपने कुछ लोगों को देखा होगा वह यदि सुबह-सुबह मन्दिर गये तो, चार लोगों को उसके बारे में बताये बिना उनका मन नहीं मानता, यदि आप मन्दिर गये तो यह आपकी श्रद्धा थी या फिर दिखावा, समझ नहीं पाते हम . . . वैसे देखा जाये तो आप जिस ईश्‍वर का भी ध्‍यान करें वह है तो एक ही बस उसके रूप अनेक होने के कारण हम भ्रमित होते हैं कोई मां दुर्गा का अनन्‍य भक्‍त लेकिन उसे माता की याद नवरात्रि के समय ही आती है ऐसा क्‍यों होता है वह नौ दिन बड़ी श्रद्धा के साथ मन्दिर जाता है, फिर छह माह के लिये मां को भूल जाता है एक भी दिन मन्दिर नहीं जा पाता ऐसा क्‍यों होता है, यह तो एक दृष्टिकोण मात्र था लोगों के नजरिये का, उनकी सोच का, हम ईश्‍वर के जिस रूप की भी पूजा करते हैं या आराधना करते हैं चाहे वह शिव का रूप हो या हनुमान जी का या फिर साईं बाबा का आप जिस किसी की भी आराधना सच्‍चे मन से करेंगे, और अपना कर्म भी करते चलेंगे तो निश्‍चय ही जीवन में सफलता मिलेगी।

इसमें से एक दो विचार आपके भी मन में कभी न कभी आये होंगे, आप भी किसी सफल व्‍यक्ति को जब देखते होंगे या उसकी मेहनत पर नजर डालते होंगे तो अच्‍छा लगा होगा, या फिर हो सकता है आपमें से किसी एक ने कभी इन बातों पर गौर कर कुछ बेहतर लिखा होगा, मुझे अच्‍छा लगता है जब कोई व्‍यक्ति पूर्ण विश्‍वास के साथ अपना कर्म करता है और ईश्‍वर में आस्‍था रखता है . . . आपभी रखते होंगे तो फिर देर किस बात की एक शीर्षक चुनें इसका . . . ।

1 टिप्पणी:

  1. अच्छा लिखा है आपने लेकिन चालाकी से शीर्षक चुनने का भार पाठकों पर छोड़ दिया। मेरी ओर से शीर्षक है "सृजन और विश्वास"।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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