शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

बसन्‍ती गीत गुनगुना रही है ..














गेहूं की बाली ने कहा,
पीली सरसों से
देख आज पवन
मुस्‍करा रही है
लगता है ऋतु बसन्‍ती
आ रही है ...।
उधर कोयल की कूक से
मुस्‍कराती
टहनी आम की
झुककर धरती से बोली
देखो कोयल
बसन्‍ती गीत
गुनगुना रही है ...।
अम्‍बर ने कहा धरती से,
अब तो तू करना
खूब श्रृंगार
फूलों के खिलने
की ऋतु
बसन्‍ती जो आ रही है ...।

21 टिप्‍पणियां:

  1. ऋतुराज बसंत की अदभुत छटा ... सब खिल उठे हैं

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  2. बसन्त का ख़ूबसूरत स्वागत...

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  3. उत्तर
    1. शनिवार के चर्चा मंच पर
      आपकी रचना का संकेत है |

      आइये जरा ढूंढ़ निकालिए तो
      यह संकेत ||

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  4. प्राकृतिक सौन्दर्य बिखेरती सुन्दर रचना ।
    बसंत पंचमी और माँ सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ । मेरे ब्लॉग "मेरी कविता" पर माँ शारदे को समर्पित 100वीं पोस्ट जरुर देखें ।

    "हे ज्ञान की देवी शारदे"

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  5. वसंत का आगमन नए संवाद का इशारा तो बना. सुंदर कविता. बधाई.

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  6. लाज़वाब! बहुत सुंदर और भावपूर्ण प्रस्तुति...

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  7. अब ये सब क़िताबी बातें लगती हैं। जीवन में कहीं कोई बसन्त बचा नहीं है हम सबके। हां,प्रकृति संदेश ज़रूर देती रहती है।

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  8. basanti bayar ke sath is basanti rachana ka jhoka sachmuch jhakjhor gaya Sada ji ....badhai ke sath abhar bhi.

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  9. फूलों के खिलने
    की ऋतु
    बसन्‍ती जो आ रही है ...।very nice.

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  10. आज 26/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर (सुनीता शानू जी की प्रस्तुति में) लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  11. सुन्दर कविता और बसंत की बधाईयां...

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  12. प्यारीसी बात ...सहज, सुन्दर प्रभावपूर्ण !

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