मंगलवार, 13 मार्च 2012

बजट चक्र और आम जन ...


हम आम जन सामान्‍य सी भाषा में  आय और व्‍यय की सूची को बजट कहते हैं, बजट किसी देश, संस्‍था, व्‍यक्तिगत अथवा किसी परिवार का भी हो सकता है, यह भविष्‍य में किये जाने वाले व्‍यय का हिसाब है जिसे हम वर्तमान में बनाते हैं, हर साल की तरह इस साल भी मार्च माह में बजट पेश होने जा रहा है ... केन्‍द्रीय बजट भारतीय राज्‍य के राष्‍ट्रीय जीवन में अपनी भूमिका और भागीदारी को ठोस रूप देता हुआ साल दर साल बदलता हुआ यह एक विचारणीय मुद्दा है बजट में सरकार की आर्थिक नीतियों का स्‍पष्‍ट संकेत मिलता है, इसके बनने की प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल होने के साथ-साथ अति गोपनीय भी होती है बजट भाषण पूरा होने के सात दिन पहले से बजट से जुड़े सभी अधिकारी और कर्मचारियों का बाहरी दुनिया से कोई सम्‍पर्क नहीं रहता है ... संसद में बजट पेश किए जाने से 10 मिनट पहले कैबिनेट को इसका संक्षिप्‍त रूप दिखाया जाता है।
अब सवाल यहां आम आदमी के बजट का या परिवार का आता है जहां घर खर्च की जरूरी चीजों के साथ बढती मंहगाई के बीच एक वर्ष तो दूर की बात एक माह का बजट भी अव्‍यवस्थित हो उठता है क्‍योंकि यहां दैनिक उपयोग में आने वाली वस्‍तुओं के दामों में जिस तरह से बढ़ोत्‍तरी होती है वहां किस खर्च को कितना और किस तरह सुनिश्चित किया जाए यह एक बड़ा सवाल बन जाता है ...केन्‍द्रीय बजट जहां अपनी जटिलताओं के चलते गोनपीय ढंग से बनाया जाता है उसमें आज भी वही पुराना ढर्रा कायम है जिसमें आम जन के उपयोग में आने वाली वस्‍तुओं को अनदेखा कर दिया जाता है जब कभी भी हुआ रसोई गैस एवं पेट्रोल के दामों में वृद्धि कर दी जाती है इस पर ध्‍यान देने के साथ सकारात्‍मक बदलाव की आवश्‍यकता भी है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

यहां तो उद्योंगों का भार भी आम जनता के माथे पर मढ़ दिया जाता है अब बात हो रही है बिजली पर वैट लगाने की ... बिजली पर वैट लगाने से आम लोगों पर दुहरी मार पड़ेगी उसे अपने घर के बिल से तो झटका लगेगा ही ... उद्योग-धंधों पर पर बढ़े बोझ का भार भी उसे उठाना पड़ेगा आम लोगों के उपयोग की चीजों के दाम बढ़ेंगे जिन्‍हें मंहगे दामों पर खरीदना होगा इस एक फैसले से सभी पर असर पड़ेगा जब उद्योग अपने उत्‍पाद मंहगे करेंगे तो प्रतिस्‍पर्धा में पीछे होंगे बाजार में पहले से ही सस्‍ते चाइनीज़ माल की भरमार है ।

बजट की सार्थकता तो तभी सिद्ध होती है जब जन पक्षीय बजट पूर्व दुराग्रहो को दूर करते हुए लकीर का फ़कीर न बनते हुए पेश किया जाए ताकि आम जन भी कुछ राहत महसूस कर सके ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. बजट आम जनता के अनुरूप नहीं आता बल्कि बजट के अनुरूप आम जनता को ढलना पड़ता है ... सार्थक चिंतन

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  2. बहुत सार्थक प्रस्तुति...

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