बुधवार, 29 अगस्त 2012

मन ...

मन .. हमारे शरीर का एक ऐसा हिस्‍सा जिसे हम में से किसी ने नहीं देखा लेकिन हमारा शरीर पूरी तरह से इसके अधीन रहता है ... सारे क्रिया-कलापों का कर्ता-धर्ता यही है ... चंचल चपल हमेशा अपनी ही करने वाला अधीर सा यह मन किसी नटखट बालक की भांति प्रतीत होता है ... इसका बचपना कभी नहीं जाता पल में उदास तो पल में खुश कभी लम्‍बी उड़ान भरता और जा पहुँचता उनके पास जो सात समंदर पार हैं या मीलों की दूरियाँ हैं जिनके बीच कभी सबके बीच में रहकर भी तन्‍हा हो जाता बगल में कौन बैठा है ? उससे भी अंजान इसकी माया निराली है तभी तो किसी ने कहा है न माला फेरत जुग गया गया न मन का फेर ...आप लाख कोशिश कर लो पूजा पाठ की जप तप की यदि मन नहीं चाहेगा तो कुछ भी करना संभव नहीं या फिर जो भी किया सिर्फ़ दिखावे के लिए ही किया ...
इसके फ़ेर में आने से कोई बचा भी तो नहीं क्‍योंकि इसे दिखावा करना भी खूब आता है ... यदि यह नहीं चाहेगा तो आप किसी को अपना सच चाहकर भी नहीं बता सकते ... तकलीफ़ सहते रहेंगे भीतर ही भीतर लाख दु:ख सतायेगा ... पर ये किसी से साझा करने ही नहीं देगा, कभी - कभी तो मुझे यह मन खिलाड़ी लगता है खेलता रहता है रोज़ नये - नये खेल और हमें खबर तब होती है जब परिणाम आता है कई बार कहता है धीरे से tit for tat ...
तभी तो कहते हैं हम सहज़ ही मन की बातें मन ही जाने ... इसकी एक बात और भी ये चंचल ही नहीं हठी भी होता है इसने जो ठान लिया उसे पूरा करके ही रहता है ..फिर चाहे कितनी भी अड़चनें आये ये पूर्णत: कृत संकल्पित हो जुट जाता है पूरे जोश के साथ ... . जैसा आज मुझे लगा इन विचारों का आपसे साझा करने का ... मैने तो कर लिया अब आपकी बारी है ... कुछ विचार आपके भी मन के बारे में ...

3 टिप्‍पणियां:

  1. मन को जब बच्चा मान ही लिया तब इससे क्या डरना बच्चे की तरह ही इससे बर्ताव करना होगा, खुद बड़े बनकर !

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  2. स्पष्ट नहीं लगा न कथन .... मन यूँ ही अस्पष्ट होता है या बना दिया जाता है .

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