मंगलवार, 17 जनवरी 2012

कुछ कहना शेष था ....





















यह जीवन का कौन सा
अध्‍याय है
समझ नहीं पा रही हूं
कल जब से
मैने उस वृद्धा को
कचरे के ढेर पर बैठकर
रोटी के टुकड़ो को
साफ करने के बाद
आपने आंचल में
बांधते देखा
ना चाहते हुए भी
आंख नम हो गई .....
आवाज देकर पुकारने में
वह हड़बड़ा कर उठी
और तेज कदमों से
अंजान सी गली में
अदृश्‍य हो गई
उसके जाने के बाद भी
वह मुझे दिखाई देती रही
पूछता रहा मौन उसका
ये कौन सा अध्‍याय है
जिसमें अपनी  ही
लाचारी के बारे में
कुछ कहना शेष था ....

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक प्रस्तुति...अन्दर तक झकझोर दिया..

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  2. ऐसा ही मैंने भी देखा था .... कूड़े के ढेर से बीनकर खाते . कुछ बेचैनी कही नहीं जा पाती...

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  3. निशब्द करती मार्मिक रचना...

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  4. वैचारिक कसौटियों पर संवेदना को समेटे हुए एक उत्कृष्ट रचना है | निश्चय ही आत्म चिंतन करने के लिए विअश कराती हुई रचना | बहुत बहुत बधाई सदा जी साथ ही सादर आभार |

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