गुरुवार, 19 अगस्त 2010

किनारों पर ....







ढूंढा करती हैं तुझको अब भी जाती हुई

सूरज की किरणें नदिया के किनारों पर ।

पत्‍थर वो नदी के सूने हैं जिन पर बैठ,

रखते थे निगाह आती जाती धारों पर ।

नहीं मिलते बचपन के साथी कोई यहां,

रहते थे यहां जो बारिश की बौछारों पर ।


9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति....


    How n where r u?

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  2. सुंदर प्रस्तुति!
    राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

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  4. धाराएं तो बह जाने के लिए ही होती हैं ।
    सब कुछ बह जाता है.... बचपन, जवानी ...और बुढ़ापा भी..
    तभी कहते हैं चरैवेती ...चरैवेती.. है न ?

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  5. सुंदर अभिव्यक्ति.
    नहीं मिलते बचपन के साथी कोई यहां,
    रहते थे यहां जो बारिश की बौछारों पर ।

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