शनिवार, 26 नवंबर 2011

ये खजाना तो ....!!!





















उसकी आंखो से दर्द
बयां होता था
पर फिर भी जाने कैसे
लबों पे उसके
तबस्‍सुम खेला करती
मैं हैरां होती
उसकी संजीदगी पे
वो मुझको समझाकर कहती
देख हंसी सब बांट लेते हैं
आंसू बांटना जरा
मुश्किल होता है
तूने सुना है न
ये कीमती होते हैं
फिर इसे कैसे बांटेगा कोई
ये खजाना तो बस
चुपचाप चोरी छिपे ही
लुटाना होता है  ....!!!

20 टिप्‍पणियां:

  1. इस खजाने को सबके सामने लुटाने लगें तो बस खारा पानी कहलाता है ... सुन्दर प्रस्तुति

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  2. बहुत खूब ||
    सुन्दर रचनाओं में से एक ||

    आभार ||

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  3. देख हंसी सब बांट लेते हैं
    आंसू बांटना जरा
    मुश्किल होता है

    ....बहुत सच कहा है...सुंदर अभिव्यक्ति...

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  4. Namaskar ji..

    Dukh bante hai halka hota...
    Sukh bante badh jata hai..
    Khushi khazane si rahti hai..
    Jo bhi ese lutata hai..

    Sundat bhav..

    Pichhle kuchh samay se bahar tha, ab punah aaya hun..kavitaon ke ras main vibhor hone ke liye..

    Deepak Shukla..

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  5. बहुत ही नाजुक से भावों को बहुत ही सम्हाल कर रचा है.अति सुंदर.

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  6. बहुत सुंदर लगी यह कविता. देरी से आने के लिए क्षमा चाहता हूँ.

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  7. कान में फुसफुसा कर कही जाने वाली बात के अंदाज़ जैसी सुंदर कविता

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  8. ये खजाना तो बस
    चुपचाप चोरी छिपे ही
    लुटाना होता है ....!!!

    वाह एक एक पंक्ति मन को छूती हुई !!
    बधाई हो सदा जी !

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  9. ओह गहरी और सच्ची बात कह दी.

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  10. देख हंसी सब बांट लेते हैं
    आंसू बांटना जरा
    मुश्किल होता है
    बेहद खूब ...सादर

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  11. बेहतरीन सुन्दर भावो की अभिवयक्ति.....

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  12. आँसू सचमुच बेशकीमती होते हैं इनका मोल दूसरे नहीं लगा सकते इसीलिये इन्हें छिपाना ही श्रेयस्कर है ! बहुत ही सुन्दर रचना !

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  13. सदा जी जय श्री राधे ...बहुत सुन्दर ब्लॉग और रचना भी ..सच आंसू होते ही ऐसे हैं
    रहिमन निज मन की व्यथा मन ही रखो गोय
    सुनी अंठीलैहैं लोग सब बांटी न लैहैं कोय
    भ्रमर ५

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