सोमवार, 14 मई 2012

कुछ समझाइशों के बादल ...!!!















कुछ विरोधी स्‍वर
मन में अपनी बातों की
पकड़ मजबूत रखते हैं
कोई कितना भी 
सच कहे
उसे यह ना मानने की 
जब शपथ ले लेते हैं
तो फिर 
नहीं मानते हैं ... 

कुछ समझाइशों के बादल
आंखों में तैरते जरूर हैं
लेकिन उन्‍हें 
बरसने के लिए
वक्‍त पर ही निर्भर
कर दिया जाता है ... 

एक शोर है आस-पास 
पर गुमनाम सा वह
कौन है जिसको
पुकार रहा है यह शोर  ...

उधार की जिन्‍दगी से अच्‍छा है
निज़ता का बोध
एक मील का पत्‍थर

14 टिप्‍पणियां:

  1. उधार की जिन्‍दगी से अच्‍छा है
    निज़ता का बोध
    एक मील का पत्‍थर... बेशक

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  2. निजता का बोध हमेशा ही होना चाहिए।

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  3. उधार की ज़िन्दगी किसी काम की नहीं।

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  4. कुछ विरोधी स्‍वर
    मन में अपनी बातों की
    पकड़ मजबूत रखते हैं
    कोई कितना भी
    सच कहे
    उसे यह ना मानने की
    जब शपथ ले लेते हैं
    तो फिर
    नहीं मानते हैं ...

    इसमें कोई बुराई भी नहीं है की पकड़ मजबूत हो पर ख्याल ये होना चाहिए की सच्ची बातों पे मजबूती हो ...

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  5. हर एक पंक्तियाँ अद्भुत सुन्दर है जिसे आपने बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत किया है! सदा दी

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  6. कल 21/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. बहुत बढ़िया प्रस्तुति..
    बेहतरीन रचना...

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  8. कुछ समझाइशों के बादल
    आंखों में तैरते जरूर हैं
    लेकिन उन्‍हें
    बरसने के लिए
    वक्‍त पर ही निर्भर
    कर दिया जाता है ... kya baat hai sada ji....shabdon ke saath bahut acchha pryog kiya hai aapne

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  9. उधार की जिन्‍दगी से अच्‍छा है
    निज़ता का बोध
    एक मील का पत्‍थर...

    खूबसूरत रचना...

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  10. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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